नई दिल्ली, दिल्ली की सेंट्रल जिला पुलिस की जांच में नवजात शिशुओं की खरीद-फरोख्त करने वाले गैंग से जुड़े कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। पुलिस की जांच में नवजात शिशुओं की खरीद-फरोख्त करने वाले गिरोह से जुड़े कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं।
पुलिस के अनुसार, खरीदे गए नवजात बच्चे बेगमपुर स्थित हीरा मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल की दूसरी मंजिल पर रखे जाते थे। इस अस्पताल की संचालिका डॉ. विवेकी गैंग की सरगना है। बीएससी नर्सिंग के बाद डॉक्टरेट की डिग्री हासिल करने वाली विवेकी अपने पति के साथ अस्पताल चलाती थी। इसका प्रचार आईवीएफ सेंटर के रूप में किया जाता था, मगर एनआईसीयू वार्ड का इस्तेमाल खरीदे गए बच्चों को रखने के लिए किया जाता था। पुलिस ने गैंग की सरगना समेत 13 लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें 5 वो लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने बच्चों को खरीदने के लिए सौदा किया था।
दो साल 30 बच्चे बेच चुका है गैंग
बच्चों को खरीदार मिलने तक अस्पताल में ही रखा जाता था और उनकी देखभाल के लिए नर्सों की व्यवस्था की गई थी। पुलिस जांच के अनुसार, गैंग पिछले दो सालों में करीब 30 बच्चों की बिक्री कर चुका है। नवजातों को उनके परिवारों से 8 से 10 हजार रुपये में खरीदकर लड़कियों को 5 से 6 लाख और लड़कों को 8 से 10 लाख रुपये तक में बेचा जाता था। एक मामले में नवजात लड़के की 18 लाख रुपये में बिक्री की भी जानकारी मिली है। गिरफ्तार खरीदारों में कई कारोबारी परिवारों से जुड़े लोग भी शामिल हैं। पुलिस ने नकली ग्राहक बनकर 5 लाख रुपये में सौदा तय किया था, जिसके बाद गैंग का पर्दाफाश हुआ।
कोडवर्ड और ऑटो-डिलीट चैट से चलता था नेटवर्क
गैंग के सदस्य बातचीत के दौरान लड़के को ‘बड़ी फाइल’ और लड़की को ‘छोटी फाइल’ कहते थे। वे टेलीग्राम की ऑटो-डिलीट चैट सुविधा का इस्तेमाल करते थे, ताकि सबूत न बचें। पुलिस का कहना है कि गैंग के कई सदस्य अब भी फरार हैं। बेचे गए बच्चों को तलाशने और पूरे नेटवर्क का खुलासा करने के लिए विभिन्न राज्यों में छापेमारी जारी है। साथ ही बच्चों के असली माता-पिता की पहचान करने का प्रयास भी किया जा रहा है। यदि जांच में यह साबित हुआ कि उन्होंने पैसों के लिए बच्चों को बेचा था, तो उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पति के नाम पर रजिस्टर्ड अस्पताल
जांच में पता चला कि अस्पताल डॉक्टर विवेकी के पति के नाम पर रजिस्टर्ड है, लेकिन संचालन की जिम्मेदारी विवेकी संभालती थी। पुलिस अब उसके पति की भूमिका की भी जांच कर रही है। विवेकी खुद को प्रसव विशेषज्ञ बताकर अस्पताल चला रही थी। गैंग के हर सदस्य की अलग भूमिका थी। गिरफ्तार विपिन बच्चों को लाने-ले जाने का काम करता था। गिरफ्तारी के समय वह एक महिला के साथ बच्चा लेने जा रहा था। उसके कब्जे से 2.92 लाख रुपये भी बरामद हुए, जिनका इस्तेमाल बच्चों की खरीद में होना था।
पड़ोसी की सूचना से खुला राज
पुलिस के अनुसार, पहाड़गंज निवासी एक व्यक्ति ने पुलिस को सूचना दी थी कि पड़ोस में रहने वाली एक महिला अलग-अलग समय पर कई नवजात शिशुओं के साथ दिखाई देती है। मामला संदिग्ध लगने पर स्पेशल स्टाफ ने जांच की तो बच्चों की खरीद-फरोख्त करने वाले गैंग के बारे में पता चला। इसके बाद एक महिला पुलिसकर्मी को ग्राहक बनाकर गैंग के पास भेजा गया। सौदा तय होने पर आरोपियों ने 5 जून को आरके आश्रम मेट्रो स्टेशन के पास एडवांस लेकर बच्चा सौंपने के लिए महिला को बुलाया। वहां पुलिस ने आरोपी ज्योति, शालू और ललित को गिरफ्तार कर एक नवजात को सुरक्षित बरामद कर लिया।
आईवीएफ सेंटर संचालिका भी गिरफ्तार
पूछताछ के बाद पुलिस ने बेगमपुर स्थित बच्चों के अस्पताल एवं आईवीएफ सेंटर की संचालिका डॉ. विवेकी, बच्चों की आपूर्ति करने वाले साबा भाई उर्फ कालिया समेत कुल 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया। पुलिस ने ग्वालियर और पानीपत से दो-दो नवजात बच्चों को बरामद किया है। सभी बच्चों को बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश करने के बाद सिविल लाइंस स्थित आश्रम में रखा गया है।
राजस्थान और गुजरात से लाए जाते थे बच्चे
पुलिस की जांच में सामने आया कि गिरफ्तार आरोपी साबा भाई राजस्थान और गुजरात के पिछड़े इलाकों से नवजात बच्चों को खरीद कर लाता था और गैंग के जरिये बेचता था। बरामद बच्चों की उम्र पांच दिन से तीन माह के बीच है। गिरोह के सदस्य नवजात बच्चों को उनके परिवारों से 8 से 10 हजार रुपये में खरीदते थे। गैंग एक संगठित नेटवर्क के रूप में काम कर रहा था।
फर्जी जन्म प्रमाणपत्र बनाकर बदल दी जाती थी पहचान
खरीदार मिलने के बाद उन्हें अस्पताल बुलाया जाता था। यहां फर्जी प्रसव संबंधी दस्तावेज और जन्म प्रमाणपत्र तैयार किए जाते थे, जिनमें असली माता-पिता की जगह खरीदार कपल का नाम होता था। पुलिस अस्पताल से जब्त सीसीटीवी की डीवीआर, कंप्यूटर, लैपटॉप और अन्य दस्तावेज की जांच कर रही है।
आरोपी सोशल मीडिया से खोजते थे खरीदार
नि:संतान दंपतियों तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया जाता था। गैंग के सदस्य ज्योति, ललित, शालू, प्रतिभा, ओमवती और विपिन संभावित ग्राहकों को लाने का काम करते थे। प्रत्येक सौदे पर उन्हें 20 हजार से 50 हजार रुपये तक कमीशन मिलता था। लड़कों की मांग अधिक होने के कारण कई बार विशेष ऑर्डर पर नवजात मंगाए जाते थे।
नकली कपल बनाकर लाए जाते थे बच्चे
पुलिस की जांच में पता चला कि डॉ. विवेकी राजस्थान के पाली और गुजरात के साबरकांठा से साबा भाई उर्फ कालिया के जरिये नवजात बच्चों की खरीदारी करती थी। इन बच्चों को वहां से लाने के लिए अलग-अलग युवक-युवतियों को पति-पत्नी बनाकर अस्पताल की कार से भेजा जाता था। यात्रा और अन्य खर्च अस्पताल उठाता था।




