नई दिल्ली, प्रकृति इस साल भारतीय किसानों का कड़ा इम्तिहान लेने के मूड में है. मौसम विभाग (आईएमडी) ने सोमवार को मानसून का जो पहला पूर्वानुमान जारी किया है, उसने न केवल वैज्ञानिकों बल्कि करोड़ों लोगों की नींद उड़ सकती है.
चेतावनी साफ है दी गई है कि इस साल मानसून धोखा दे सकता है. अगर आप सोच रहे हैं कि यह एक साधारण मौसमी बदलाव है, तो सावधान हो जाइए, क्योंकि अगले 90 दिनों के भीतर भारत के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों की थाली तक इसका गहरा असर दिखने वाला है.
मौसम विभाग के मुताबिक, इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान बारिश ‘सामान्य से कम’ (Below Normal) रहने वाली है. आंकड़ों की बात करें तो कुल बारिश लंबी अवधि के औसत (LPA) का केवल 92% रहने का अनुमान है. वैज्ञानिकों के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात जून नहीं, बल्कि जुलाई के बाद का समय है. पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. रविचंद्रन के अनुसार, वर्तमान में ‘ला नीना’ की स्थिति कमजोर पड़ रही है और जुलाई तक ‘अल नीनो’ सक्रिय हो जाएगा. ‘अल नीनो’ एक ऐसी वैश्विक समुद्री स्थिति है, जो भारत में सूखे और कम बारिश के लिए जिम्मेदार मानी जाती है. इसका मतलब है कि जब फसलों को सबसे ज्यादा पानी की जरूरत होगी, तब आसमान से आग बरसेगी और बादल नदारद रहेंगे.
खरीफ फसलों पर डेथ वारंट?
भारत की 75% से अधिक सालाना बारिश जून से सितंबर के दौरान होती है. देश की कृषि अर्थव्यवस्था पूरी तरह से इसी पर टिकी है. वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि मानसून के दूसरे भाग जुलाई-अगस्त-सितंबर में बारिश की कमी होने की संभावना है. इसका सबसे घातक असर खरीफ फसलों पर पड़ेगा. धान, मक्का, सोयाबीन और कपास जैसी फसलें, जो पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं, उनके बर्बाद होने का खतरा बढ़ गया है. अगर समय रहते सिंचाई के वैकल्पिक इंतजाम नहीं किए गए या किसानों ने कम पानी वाली फसलों की ओर रुख नहीं किया, तो 90 दिन बाद खेतों में हरियाली के बजाय दरारें नजर आ सकती हैं. यह संकट केवल अनाज तक सीमित नहीं रहेगा; कम उत्पादन का मतलब है-महंगाई का आसमान छूना.
क्या ये फाइनल अलर्ट है?
आईएमडी का कहना है कि वे मई में दूसरा पूर्वानुमान जारी करेंगे, जिसमें जिला स्तर पर इसके बारे जानकारी दी जाएगी. लेकिन वर्तमान जानकारी में 5% ऊपर-नीचे की गलती की गुंजाइश है, जिसका अर्थ है कि स्थिति और भी बदतर हो सकती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह साल ‘अल नीनो’ के प्रभाव के कारण पिछले कई सालों के मुकाबले सबसे कठिन हो सकता है. सरकार और कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि वे अभी से जल संरक्षण और सूखे को सहने वाली बीजों की किस्मों पर ध्यान दें. अगर अब भी लापरवाही बरती गई, तो मानसून के खत्म होते-होते ग्रामीण भारत एक बड़े आर्थिक संकट की चपेट में होगा.
अल-नीनो क्या है?
अल नीनो प्रशांत महासागर की एक जटिल मौसमी घटना है, जो तब घटती है जब दक्षिण अमेरिका के तट के पास पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का पानी गर्म हो जाता है. सामान्य परिस्थितियों में ये व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को पश्चिम की ओर धकेलती हैं, लेकिन अल नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे गर्म पानी वापस पूर्व की ओर बहने लगता है और वैश्विक वायुमंडलीय सर्कुलेशन का संतुलन बिगड़ जाता है. भारतीय मानसून के संदर्भ में बात करें यह मानसूनी हवाओं के सामान्य प्रवाह को बाधित करती है. नमी से भरी हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप से दूर ले जाती है, जिसकी वजह से भारत में बारिश ‘सामान्य से कम’ होती है, सूखे जैसी स्थिति पैदा होती है.




