लखनऊ, उत्तर प्रदेश में 2026 के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर सरकार भले ही समय पर चुनाव कराने की तैयारी में जुटी हो, लेकिन आरक्षण को लेकर लिया जा रहा फैसला आने वाले समय में राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर बड़ा असर डाल सकता है।
संकेत साफ हैं कि सरकार 2026 के पंचायत चुनाव 2021 में तय आरक्षण व्यवस्था के आधार पर ही कराने जा रही है। यही वजह है कि ओबीसी आरक्षण के लिए जरूरी समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का प्रस्ताव महीनों से शासन में ठंडे बस्ते में पड़ा है।
पंचायती राज निदेशालय ने करीब पांच महीने पहले आयोग गठन का प्रस्ताव शासन को भेजा था, लेकिन अब तक इसे कैबिनेट की मंजूरी के लिए भी पेश नहीं किया गया। सूत्रों का कहना है कि अगर अब आयोग गठित भी होता है, तो उसे आरक्षण से जुड़ी रिपोर्ट तैयार करने में कम से कम तीन से चार महीने लगेंगे। ऐसे में सरकार नए सिरे से आरक्षण तय करने के बजाय पुराने फॉर्म्युला को ही आगे बढ़ाने का मन बना चुकी है।
परिसीमन बदला, लेकिन आरक्षण जस का तस
2026 के पंचायत चुनाव से पहले ग्राम पंचायतों, ग्राम पंचायत वार्डों, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत वार्डों का पुनर्गठन पूरा हो चुका है। परिसीमन के बाद कई इलाकों की जनसंख्या संरचना और सामाजिक संतुलन पूरी तरह बदल गया है। इसके बावजूद यदि आरक्षण 2021 के आंकड़ों के आधार पर लागू किया जाता है, तो यह जमीनी प्रतिनिधित्व में असमानता पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ ऐसे वार्ड होंगे, जहां अब आरक्षित वर्ग की आबादी पहले जैसी नहीं रह गई है, लेकिन सीट फिर भी आरक्षित रहेगी। वहीं कुछ नए या बदले हुए क्षेत्रों में आरक्षण की वास्तविक जरूरत होने के बावजूद सीट अनारक्षित रह सकती है। इसका सीधा असर ग्राम पंचायत और क्षेत्र पंचायत स्तर पर देखने को मिल सकता है, जहां स्थानीय संतुलन सबसे अधिक संवेदनशील होता है।
ओबीसी आयोग न बनने से बढ़ सकता है कानूनी जोखिम
समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन न होना सरकार के लिए भविष्य में कानूनी चुनौती बन सकता है। यदि चुनाव के बाद कोई प्रत्याशी या सामाजिक संगठन अदालत में यह सवाल उठाता है कि ओबीसी आरक्षण बिना आयोग की रिपोर्ट के लागू किया गया, तो पंचायत चुनावों की वैधता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
हालांकि, सरकार फिलहाल इस जोखिम को नजरअंदाज करते हुए चुनाव प्रक्रिया को समय पर पूरा करने पर ज्यादा जोर दे रही है। प्रशासनिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कानूनी विवाद बाद में देखे जाएंगे, लेकिन चुनाव टालने का विकल्प सरकार के पास नहीं है।
जिला पंचायत सदस्यों की संख्या घटने से बदलेगा सत्ता संतुलन
सूत्रों के अनुसार पुनर्गठन के बाद 2026 के पंचायत चुनाव में जिला पंचायत सदस्यों की संख्या घटकर करीब 3000 रह जाने की संभावना है। इसके साथ ही ग्राम पंचायत वार्डों की संख्या में भी करीब 4600 की कमी आ सकती है। यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर राजनीतिक ताकत के संतुलन पर पड़ेगा।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक हर जिला पंचायत सीट का महत्व बढ़ेगा। जिला पंचायत अध्यक्ष पद की राजनीति और तीखी होगी। बड़े दलों की पकड़ और मजबूत हो सकती है।छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका सीमित होने की आशंका है।
जातीय जनगणना बनी सरकार की ढाल
विभागीय सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार जातीय जनगणना कराने का फैसला कर चुकी है और उसी के आधार पर भविष्य में आरक्षण का नया फॉर्म्युला तय किया जाएगा। चूंकि जनगणना प्रक्रिया में अभी समय लगेगा, इसलिए सरकार 2026 के पंचायत चुनाव में नया आरक्षण तय करने के बजाय पुराने आरक्षण के आधार पर चुनाव कराने को सुरक्षित विकल्प मान रही है। हालांकि, इस मुद्दे पर सरकार की ओर से अभी तक कोई औपचारिक बयान नहीं आया है, लेकिन तैयारियों की दिशा साफ तौर पर इसी ओर इशारा कर रही है।
एक्सक्लूसिव एनालिसिस
2026 का पंचायत चुनाव केवल स्थानीय निकाय चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह आरक्षण नीति, परिसीमन और राजनीतिक संतुलन की परीक्षा भी बनेगा। पुराने आरक्षण के आधार पर चुनाव कराना सरकार के लिए प्रशासनिक रूप से आसान हो सकता है, लेकिन बदली हुई सामाजिक संरचना और संभावित कानूनी चुनौतियां आने वाले समय में नई मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं।




