लखनऊ । ऐतिहासिक रूप से मदरसे भारत की शिक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं। मदरसों का हमेशा से उद्देश्य रहा है कि वह अपने विद्यार्थियों को एक सच्चा मुसलमान बनाने के साथ-साथ एक सच्चा नागरिक भी बनाएं। वर्तमान हालात में मदरसों में आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने के बीच इसी दिशा में एक खास पहल के तहत इन संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को भारत के कानून और संविधान की जानकारी देने के लिए एक किताब तैयार की गई है।
जमीयत उलमा-ए-हिंद उत्तर प्रदेश के विधिक सलाहकार मौलाना काब रशीदी द्वारा लिखित यह किताब भारत के संविधान और विभिन्न कानूनों की मूलभूत जानकारी को खुद में समेटे है और निश्चित रूप से इसे मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को अपने कानूनी तथा संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के बारे में भी जानकारी मिलेगी जिससे वह बेहतर नागरिक भी बनेंगे।
इतिहास गवाह है कि भारत की आजादी से लेकर सामाजिक क्षेत्र में भी मदरसों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मदरसे स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र रहे हैं और इसके तमाम दृष्टांत इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं लेकिन समय के साथ इस बात की जरूरत महसूस हुई है कि इन संस्थानों में बच्चों को कानून और संविधान के बारे में भी जानकारी जरूर दी जाए। कोई भी समाज या संस्था समय से कदमताल करके ही आगे बढ़ सकती है और यह बात मदरसों पर भी लागू होती है।
देश के मदरसों में लागू पाठ्यक्रमों में भारत के संविधान और कानून को एक विषय में के रूप में पढ़ाये जाने के उदाहरण लगभग ना के बराबर हैं। लिहाजा मौजूदा हालात में बहुत जरूरी है कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को और अच्छा तथा ज्यादा जागरूक नागरिक बनाने के लिए उन्हें मुल्क के कानून और संविधान के बारे में भी पढ़ाया जाए। यह पुस्तक इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए ही तैयार की गई है। आधुनिक दौर में नई शिक्षा नीति के हिसाब से और वर्तमान हालात में बच्चों की जरूरत के हिसाब से और हालात के एतबार से हम संविधान को भी अपने पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
मौलाना रशीदी ने बताया कि इस किताब को देश के सभी मदरसों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, इसके लिए व्यापक अभियान चलाते हुए मुल्क के तमाम मदरसों तथा दीनी तालीम देने वाले अन्य इदारों से संपर्क किया जाएगा। इसके अलावा तमाम मस्जिदों में भी जाकर इस सिलसिले में जिम्मेदार लोगों को प्रेरित किया जाएगा। साथ ही इसके लिए देश की विभिन्न मदरसा शिक्षा परिषदों से भी संपर्क किया जाएगा कि वे अपनी निगरानी वाले मदरसों के पाठ्यक्रम में इस किताब को भी शामिल करें।
यह किताब दरअसल मदरसों में सुधार (रिफॉर्म्स) की एक शुरुआत है। आज के हालात को देखते हुए यह बात बार-बार कही जाती है कि मदरसों में सुधार होना ज़रूरी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि ये सुधार करेगा कौन? क्या यह काम सरकारें करेंगी, या कुछ बाहरी लोग? या फिर वे लोग, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी—पचास-साठ साल—मदरसों में बिताई है? साफ़ तौर पर कहा जा सकता है कि असली और संतुलित सुधार वही लोग कर सकते हैं, जो शुरू से मदरसों से जुड़े रहे हैं। वही लोग मदरसों की शिक्षा-प्रणाली, उनके ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) और उनकी बुनियादी भावना को सही तरह से समझते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि सुधार इस तरह किए जाएं कि मदरसों की आत्मा को ठेस न पहुंचे, बल्कि उसकी हिफाज़त और मजबूती हो।
मदरसों के संस्थापकों ने जिस मकसद से इन संस्थानों की नींव रखी थी, अगर सुधार के नाम पर उसी मकसद को नज़रअंदाज़ कर दिया गया, तो ऐसे सुधार आने वाली पीढ़ियों के लिए अच्छे संकेत नहीं होंगे। सही सुधार वही है, जो परंपरा और मूल उद्देश्यों को बचाते हुए समय के साथ आगे बढ़े।
मौलाना रशीदी ने कहा कि वर्तमान हालात में ‘संविधान परक चेतना’ अब सिर्फ एक एकेडमिक जरूरत ही नहीं, बल्कि मदरसों से जुड़े लोगों के लिए एक अनिवार्य कर्तव्य भी बन गई है। यही सोच इस पुस्तक की रचना की प्रेरक बनी। इसमें भारत के संविधान की मूल भावना को आसान लेकिन सार्थक ढंग से पेश करने की कोशिश की गई है ताकि ज्ञान और जागरूकता के इस माध्यम से एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया जा सके जो न सिर्फ संवैधानिक हो, बल्कि गरिमा और संतुलन का आईना भी हो।
…. शीर्षक वाली इस किताब में कुल सात अध्याय हैं और इस किताब को मनोवैज्ञानिक तरीके से तैयार किया गया है ताकि मदरसों के बच्चे इसमें शामिल सामग्री को बेहतर ढंग से समझ सकें और उसे अपने जीवन में उतार सकें। पुस्तक के पहले अध्याय में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि और संघर्ष का एक संक्षिप्त विवरण पेश किया गया है। इसमें स्वतंत्रता सेनानियों की सेवाओं और उनके बेमिसाल बलिदानों का संक्षिप्त लेकिन सार्थक जिक्र किया गया है।
किताब के दूसरे अध्याय में भारत में न्यायिक और संवैधानिक व्यवस्था के विकास की एक व्यापक और विचारोत्तेजक झलक पेश की गई है, जिसमें पुरानी रवायतों (परंपराओं) से लेकर आधुनिक युग तक के ऐतिहासिक चरणों का एक सुसंगत क्रम में वर्णन किया गया है। यह खास तौर पर भारत के संविधान की पृष्ठभूमि पर रोशनी डालता है जिनसे गुजरकर यह महान दस्तावेज़ अपने वर्तमान स्वरूप तक पहुंचा। इस संदर्भ में, संविधान सभा की स्थापना, उसकी संरचना, और उसकी बौद्धिक तथा व्यावहारिक भूमिका को भी स्पष्टता के साथ पेश किया गया है। इसके अलावा सभा की विभिन्न समितियों और उप-समितियों की ज़िम्मेदारियों और उनसे जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों का भी बड़े ही ध्यानपूर्वक जिक्र किया गया है।
किताब का तीसरा अध्याय भारत के संविधान का दर्शन और उसकी प्रस्तावना, व्याख्या और विवेचन पर आधारित है। इसमें भारत के संविधान की मुख्य विशेषताओं और उसकी विशिष्ट गुणों को विस्तार से समझाया गया है। इस अध्याय में प्रस्तावना (जिसे सही ही संविधान की ‘आत्मा’ माना जाता है) पर एक विस्तृत और सटीक चर्चा प्रस्तुत की गई है। चौथा अध्याय सर्वोच्च न्यायालय की स्थिति और अधिकार का एक स्पष्ट और सरल खाका प्रस्तुत करता है। वहीं, पांचवां अध्याय मौलिक अधिकारों का परिचय, उनका महत्व और उनकी संवैधानिक स्थिति पर आधारित है। इसके अलावा छठे अध्याय में मौलिक कर्तव्यों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उनकी प्रकृति की व्याख्या करता है, और यह बताता है कि ये कर्तव्य केवल औपचारिक आवश्यकताएं नहीं हैं; बल्कि, वे राष्ट्रीय जीवन के शासन का एक अभिन्न अंग हैं।
किताब का अंतिम अध्याय इस्लामी शिक्षण संस्थानों की संवैधानिक स्थिति और अदालतों की व्याख्याओं पर एक सारगर्भित और व्यापक दस्तावेज है। इसमें सर्वोच्च न्यायालय और राज्य की अदालतों के इन महत्वपूर्ण निर्णयों को सावधानीपूर्वक संकलित किया गया है।
यह किताब मदरसों में पढ़ रहे बच्चों को आधुनिक शिक्षा के अनुरूप संविधान और कानून के बारे में मूलभूत जानकारी देकर उन्हें अच्छा नागरिक बनाने का एक प्रयास है। यह समय की मांग भी है। उम्मीद है कि न सिर्फ मदरसे बल्कि उन में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को मुख्य धारा में लाने वाली शिक्षा की पक्षधर दिख रही सरकारें भी इसके महत्व को समझते हुए इसे समर्थन देंगी।




