सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को थमाया एक ऐसा नोटिस, जिसने उड़ा दीं मोदी सरकार की नींद

नई दिल्ली, भारतीय राजनीति में आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जिसे छूते ही सियासी गलियारों में आग लग जाती है। अभी यूजीसी (UGC) के नए नियमों को लेकर मचा बवाल शांत भी नहीं हुआ था कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक ऐसा नोटिस थमा दिया है, जिसने मोदी सरकार के सामने ‘एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई’ वाली स्थिति पैदा कर दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है कि आखिर 2024 के उस ऐतिहासिक फैसले पर अब तक क्या कार्रवाई हुई, जिसमें एससी-एसटी आरक्षण के भीतर ‘वर्गीकरण’ और ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने की बात कही गई थी। यह महज एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों दलितों और आदिवासियों के भविष्य से जुड़ा वो सवाल है जो आने वाले चुनावों का रुख बदल सकता है।

कोर्ट का वो फैसला जिसने हिला दी थी सियासत

1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने एक क्रांतिकारी फैसला सुनाया था। अदालत ने कहा था कि एससी-एसटी समुदाय के भीतर भी कुछ ऐसी जातियां हैं जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है, इसलिए राज्यों को ‘कोटा के भीतर कोटा’ बनाने का अधिकार मिलना चाहिए। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि कोर्ट ने ओबीसी की तरह एससी-एसटी आरक्षण में भी ‘क्रीमी लेयर’ यानी संपन्न लोगों को आरक्षण से बाहर करने की वकालत की थी। इस फैसले के बाद पूरे देश में दलित समुदाय सड़कों पर उतर आया था और मायावती से लेकर चिराग पासवान तक, सभी ने इसे आरक्षण खत्म करने की साजिश करार दिया था।

जब 100 सांसदों ने पीएम मोदी को घेरा

इस विवाद की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2024 में एनडीए के ही करीब 100 एससी-एसटी सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। उनका साफ कहना था कि इस फैसले को किसी भी कीमत पर लागू नहीं किया जाना चाहिए। उस समय विरोध की आग को शांत करने के लिए केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भरोसा दिलाया था कि सरकार बाबा साहेब अंबेडकर के मूल संविधान के साथ है और एससी-एसटी में क्रीमी लेयर का कोई प्रावधान नहीं होगा। सरकार के इसी आश्वासन के बाद आंदोलन थमा था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने फिर से उसी फाइल को खोल दिया है।

दूध दिया नहीं और क्रीम निकालने की तैयारी?

अखिल भारतीय अंबेडकर महासभा के अध्यक्ष अशोक भारती जैसे दलित चिंतकों का कहना है कि यह आरक्षण को खत्म करने की एक गहरी साजिश है। उनका तर्क है कि आरक्षण कोई गरीबी हटाने का प्रोग्राम नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है। उनका कहना है कि सरकार ने अभी तक दलितों और आदिवासियों को उनका पूरा हक यानी ‘दूध’ तो दिया नहीं और अब वे उसमें से ‘क्रीम’ निकालने की बात कर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि अगर सरकार कोर्ट के आदेश पर क्रीमी लेयर लागू करती है, तो दलित समाज का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच सकता है, जो बीजेपी के लिए चुनावी तौर पर आत्मघाती साबित होगा।

जातियों का गणित और सत्ता का पेच

सियासी तौर पर यह मुद्दा बेहद पेचीदा है। उत्तर प्रदेश में मायावती का जाटव समाज, बिहार में चिराग पासवान का दुसाध समुदाय और राजस्थान का मीणा समाज ये सभी वो वर्ग हैं जिन्होंने आरक्षण का लाभ लिया है और वे वर्गीकरण या क्रीमी लेयर के सख्त खिलाफ हैं। ये समुदाय राजनीतिक रूप से इतने ताकतवर हैं कि कोई भी दल इनसे दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहता। अब देखना यह है कि मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट में क्या रिपोर्ट पेश करती है? क्या वह दलितों के वोट बैंक को बचाएगी या कोर्ट के आदेश का पालन कर एक नए जन-आंदोलन को जन्म देगी?

Related Posts