लखनऊ, खेल के मैदान में जीत-हार को सेकंड, मीटर और अंकों में आँका जाता है। लेकिन कुछ मैदान ऐसे होते हैं, जहाँ परफार्मेंस का मतलब पदक के आगे प्यार बन जाता है। 15 वर्षीय प्रत्युष राज जैन की कहानी में प्रतिबद्धता है, परफार्मेंस है, पदक है और सबसे बढ कर उस जिजीविषा के लिए प्यार है जो दिव्यांगता को दिव्य अंग के रूप में चरितार्थ करता है कि मेरे अंग, तंग नहीं बल्कि विशेष क्षमता रखते है। बौद्धिक दिव्यांगता के साथ जीवन जी रहे प्रत्युष के लिए 2025–26 का खेल आत्मविश्वास और उपलब्धियों का स्वर्णिम अवसर बनकर आया है

प्रत्युष ने तैराकी और एथलेटिक्स में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन करते हुए समाज की धारणाओं को ध्वस्त करते हुए सफलता के झंडे गाड़े।
स्विमिंग पूल के किनारे खड़ा प्रत्युष जब पानी में उतरता है, तो वह केवल एक तैराक नहीं रह जाता, बल्कि संघर्ष, साधना और सफलता की जीवंत कहानी बन जाता है। उसकी आँखों में गहरी एकाग्रता और चेहरे पर आत्मविश्वास साफ झलकता है। पानी की हर लहर के साथ वह अपने डर, सीमाओं और चुनौतियों को पीछे छोड़ता चला जाता है। प्रत्युष का सफर आसान नहीं रहा। रोज़ाना कड़ी मेहनत, अनुशासन और धैर्य के साथ उसने खुद को तराशा। दिल्ली राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में उसने तीन स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। स्पेशल ओलंपिक्स की राज्य चैंपियनशिप में 25 और 50 मीटर फ्रीस्टाइल में स्वर्ण पदक हासिल किया तथा तीसरी दिल्ली राज्य पैरा तैराकी चैंपियनशिप में 200 मीटर फ्रीस्टाइल में स्वर्ण और 100 मीटर में रजत पदक जीता। यहीं से प्रत्युष ने राष्ट्रीय फलक की ओर छलांग लगाई। हैदराबाद में हुई 35वीं राष्ट्रीय पैरा तैराकी चैंपियनशिप में 200 मीटर फ्रीस्टाइल में 9वां और 100 मीटर में 11वां स्थान हासिल कर उन्होंने साबित कर दिया कि जज़्बा, किसी भी शारीरिक चुनौती से बड़ा होता है।
इस सफलता के पीछे एस.पी. मुखर्जी स्विमिंग पूल कॉम्प्लेक्स और कोच रणबीर शर्मा का मार्गदर्शन अहम रहा, जिन्होंने प्रत्युष में सिर्फ तैराक नहीं बल्कि अनुशासित, धैर्यवान और आत्मविश्वासी खिलाड़ी के रूप में गढ़ा। तैराकी के अलावा प्रत्युष ने फरवरी 2026 में आयोजित दिल्ली राज्य पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में गोला फेंक में रजत, लंबी कूद और 400 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर अपनी अलग पहचान बनाई। स्पोर्टेबिलिटी खेल अकादमी में मिले प्रशिक्षण ने उनमें आत्मविश्वास पैदा किया। नरेश सचदेवा के नेतृत्व और कोच संजय के मार्गदर्शन ने उनके प्रतिभा को निखारा । प्रत्युष की कहानी बताती है कि मंच बदल सकता है मगर मेहनत से मंजिल जरूर मिलती है।
बौद्धिक दिव्यांग बच्चों के लिए खेल, केवल पसीना बहाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन को समझने की पाठशाला है। प्रत्युष की कहानी इसी का जीवंत प्रमाण है। खेल के मैदान में उतर कर सीखा कि ध्यान कैसे केंद्रित किया जाता है तथा शरीर और मन का तालमेल कैसे किया जाता है। हार ने उसे टूटना नहीं, संभलना सिखाया और जीत ने विनम्रता का पाठ पढ़ाया। टीम के साथ खेलते हुए उसने ‘मैं’ से ‘हम’ तक का सफर तय किया। खेल ने प्रत्युष के भीतर आत्मविश्वास की ऐसी लौ जलाई जिसने उसे जीवन के हर अंधेरे से भिड़ने का साहस दिया। प्रत्युष राज की कहानी उन हज़ारों परिवारों के लिए ज्योति पुंज है जो अपने दिव्यांग बच्चों के भविष्य को लेकर आशंकित रहते हैं लेकिन सच तो ये है कि अगर उन्हें मंच, मार्गदर्शन और मौका मिले तो हर दिव्यांग बच्चा यही बोलेगा “आफकोर्स आई कैन”




